भय से परे सनातन धर्म - गृहस्थ जीवन, शांति, स्वास्थ्य एवं व्यावहारिक मार्ग

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भय से परे सनातन धर्म - गृहस्थ जीवन, शांति, स्वास्थ्य एवं व्यावहारिक मार्ग


भय से परे सनातन धर्म - गृहस्थ जीवन, शांति, स्वास्थ्य एवं व्यावहारिक मार्ग

लेखक: सचिन भारद्वाज

हाल ही में कुछ मित्रों के साथ धर्म, पूजा और जीवनशैली को लेकर चर्चा हो रही थी। बातचीत के दौरान एक बात बार-बार मन में आई कि आज हमारे समाज का एक बड़ा वर्ग धर्म को समझने के बजाय उससे डरने लगा है।

आधुनिकता और भागदौड़ भरी जिंदगी के बीच हम मानसिक शांति की खोज में तो भटक रहे हैं, लेकिन धर्म के वास्तविक बोध से दूर होते जा रहे हैं। धर्म, जो मनुष्य को निर्भय बनाने और आत्मिक उन्नति का मार्ग दिखाने के लिए था, आज विडंबना यह है कि भय और भ्रम फैलाने का माध्यम बनता जा रहा है।

हममें से अधिकांश गृहस्थ लोग धर्म के नाम पर ऐसे भ्रम, भय और कर्मकांड में उलझ गए हैं जिनका न तो सनातन धर्म के मूल स्वरूप से कोई संबंध है और न ही आधुनिक विज्ञान से।

विभिन्न भ्रांतियों और व्यापारिक विज्ञापनों के इस दौर में असली अध्यात्म कहीं खो गया है। ग्रंथों को पढ़ने और जीवन को व्यावहारिक दृष्टि से समझने के बाद मुझे लगा कि आज हर भारतीय गृहस्थ को अपनी पूजा पद्धति और जीवनशैली पर एक बार शांत मन से पुनर्विचार अवश्य करना चाहिए। हमें यह सोचना होगा कि क्या हमारी दैनिक दिनचर्या और धार्मिक अभ्यास हमें वास्तविक शांति दे रहे हैं या केवल मानसिक तनाव और सामाजिक दबाव बढ़ा रहे हैं।

मेरा उद्देश्य किसी की आस्था पर प्रश्न उठाना नहीं है। मेरा उद्देश्य केवल इतना है कि हम सनातन के उस मूल स्वरूप को समझें जो भय नहीं, बल्कि प्रेम, विवेक, कर्म और आत्मअनुशासन की शिक्षा देता है। सनातन परंपरा का ध्येय सदैव मनुष्य का कल्याण और मानसिक स्वतंत्रता रहा है, न कि उसे किसी अंधविश्वास की श्रृंखलाओं में बाँधना।

अपने अध्ययन और अनुभव के आधार पर कुछ विनम्र विचार साझा कर रहा हूँ।


तंत्र मंत्र साधना क्या है और क्या यह आम गृहस्थों के लिए है?

आजकल सोशल मीडिया, टेलीविजन और बाजार में तंत्र मंत्र को लेकर अनेक प्रकार की बातें सुनने को मिलती हैं। कुछ लोग इसे चमत्कार का माध्यम मानते हैं तो कुछ डर का। इस विषय को लेकर समाज में इतना रहस्य और भ्रांति पैदा कर दी गई है कि लोग आसानी से इसका शिकार हो जाते हैं।

वास्तव में तंत्र कोई जादू टोना नहीं है। यह मन और शरीर की ऊर्जा को नियंत्रित करने का एक गूढ़ विज्ञान (Esoteric Science) है। जैसे किसी वैज्ञानिक प्रयोगशाला में काम करने के कठोर नियम होते हैं, जहाँ सूक्ष्म से सूक्ष्म त्रुटि भी बड़े विस्फोट या दुर्घटना का कारण बन सकती है, वैसे ही तंत्र साधना भी अत्यंत अनुशासन और विशेष विधियों पर आधारित होती है। इसके अंतर्गत गुरु-शिष्य परंपरा, शारीरिक-मानसिक शुद्धि और विशिष्ट मंत्रोच्चार का अत्यंत सटीक संपादन अनिवार्य होता है।

लेकिन क्या यह सामान्य गृहस्थ के लिए है?

मेरा उत्तर है, बिल्कुल नहीं।

तंत्र साधना आम गृहस्थों के लिए नहीं बनी है। इसके नियम अत्यंत कठोर हैं। छोटी सी त्रुटि, गलत उच्चारण या विधि में चूक साधक के मानसिक संतुलन और जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है। गृहस्थ जीवन का वातावरण, खान-पान और दैनिक जिम्मेदारियाँ इस प्रकार की तीव्र ऊर्जावान साधनाओं के अनुकूल नहीं होतीं। इसी कारण शास्त्रों ने गृहस्थ के लिए नाम जप, सात्विक पूजा, ध्यान और सदाचार को ही सबसे सुरक्षित और श्रेष्ठ साधना बताया है। भगवान का सरल स्मरण, निस्वार्थ भाव से किया गया जप और नैतिक आचरण ही गृहस्थ के लिए तंत्र के समान फलदायी और परम कल्याणकारी होता है।

कुलदेवी या कुलदेवता की पूजा, मंदिर दर्शन और ग्रंथों का अध्ययन

यदि गृहस्थ जीवन के आध्यात्मिक संतुलन को एक सरल रूप में समझना हो तो वह कुछ इस प्रकार है:

  • घर में कुलदेवी या कुलदेवता का पूजन और कुछ मिनट का शांत ध्यान।
  • मंदिर में अन्य देवी देवताओं के दर्शन और श्रद्धापूर्वक भाव प्रकट करना।
  • जीवन में धर्मग्रंथों का अध्ययन और उनके बताए मार्ग पर चलना।

सनातन परंपरा में कुलदेवी या कुलदेवता का विशेष महत्व माना गया है। हमारे पूर्वजों का जो सूक्ष्म ऊर्जा क्षेत्र (Energy Cycle) है, वह कुलदेवी या कुलदेवता से जुड़ा माना जाता है। वंश परंपरा, आनुवंशिक ऊर्जा और पारिवारिक सुरक्षा का मुख्य केंद्र कुलदेवता या कुलदेवी की कृपा ही होती है। इसलिए घर में सबसे पहला स्थान उनकी उपासना का होना स्वाभाविक है।

इसके साथ ही घर को अनेक देवी देवताओं की तस्वीरों का संग्रहालय बनाने के बजाय मंदिर जाकर श्रद्धा से दर्शन करना अधिक उचित है। प्रायः देखने में आता है कि लोग घरों में अनगिनत चित्र और मूर्तियाँ एकत्र कर लेते हैं, लेकिन उनकी स्वच्छता और मर्यादा का पालन नहीं कर पाते। मंदिर जाना समाज को आपस में जोड़ने, सात्विक वातावरण में कुछ क्षण बिताने और एक दिव्य ऊर्जा को महसूस करने का स्थान है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भगवान श्रीकृष्ण, भगवान श्रीराम या भगवान शिव की तस्वीर के सामने केवल दीप जलाने से कहीं अधिक श्रेष्ठ है कि हम गीता, रामचरितमानस और अन्य धर्मग्रंथों का अध्ययन करें तथा उनमें बताए गए सत्य, कर्तव्य, संयम और सदाचार को अपने जीवन में उतारें। केवल कर्मकांडी पूजा से जीवन परिवर्तित नहीं होता, बल्कि ग्रंथों के अध्ययन से बुद्धिमत्ता, सही-गलत का विवेक और जीवन जीने की कला प्राप्त होती है।

डर और भय की वजह से पूजा करना

आज बहुत से लोग इस भावना से पूजा करते हैं कि यदि आज दीपक नहीं जलाया, पूजा नहीं की या कोई नियम छूट गया तो भगवान नाराज़ हो जाएंगे या कोई अनहोनी हो जाएगी।

संस्कारों और धर्म के नाम पर इस प्रकार के मनोवैज्ञानिक डर को बचपन से ही हमारे मस्तिष्कों में गहराई से बिठा दिया जाता है। लोग भयमुक्त होने के लिए मंदिर जाते हैं, किंतु वहाँ से और अधिक भयभीत होकर लौटते हैं।

लेकिन क्या ईश्वर वास्तव में ऐसे हैं?

मेरा मानना है कि नहीं।

ईश्वर कोई तानाशाह या बदला लेने वाला नहीं है जो पूजा न मिलने पर दंड देने लगे। ईश्वर चेतना का वह परम स्वरूप है जो करुणा, प्रेम और आनंद से परिपूर्ण है।

भय के कारण की गई पूजा केवल मन में तनाव और असुरक्षा बढ़ाती है। ऐसी उपासना से शांति मिलने के बजाय केवल मानसिक द्वंद्व पैदा होता है। गीता में भी बताया गया है कि भय, लालच या किसी अनिष्ट से बचने की भावना से की गई उपासना सात्विक नहीं मानी जाती।

भक्ति का वास्तविक आधार प्रेम, श्रद्धा और कृतज्ञता है। जैसे बच्चा अपनी माँ के पास प्रेम से जाता है, डर से नहीं। उसे अपनी माँ से कोई डर नहीं होता कि यदि वह थोड़ा देर से मिला तो माँ उसे हानि पहुँचाएगी। उसी प्रकार ईश्वर से संबंध भी प्रेम का होना चाहिए, भय का नहीं। ईश्वर के प्रति हमारा समर्पण सहज, प्रसन्नचित्त और निर्भय होना चाहिए।

कर्मकांड के नाम पर महिलाओं के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़

यह विषय मुझे सबसे अधिक चिंतित करता है।

आज भी गांवों, कस्बों तथा अनेक गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों में यह परंपरा देखने को मिलती है कि घर की महिलाएं सुबह से बिना कुछ खाए पिए घर के सभी कामों में लगी रहती हैं और कई बार दस या ग्यारह बजे तक भोजन किए बिना पूजा पाठ करती रहती हैं। परिवार के स्वास्थ्य और खुशहाली की कामना करने वाली महिलाएं अपने स्वयं के पोषण की पूरी तरह अनदेखी कर देती हैं।

इससे कोई धार्मिक लाभ नहीं मिलता। इसके विपरीत लंबे समय तक खाली पेट रहने से एसिडिटी, माइग्रेन, पोषण की कमी, कमजोरी और अनेक शारीरिक तथा मानसिक समस्याएं जन्म लेने लगती हैं। जिस धर्म का मूल उद्देश्य जीवन को सुखी और निरोगी बनाना हो, वह कभी भी किसी के स्वास्थ्य की बलि माँगने का समर्थन नहीं कर सकता।

"शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्।"

अर्थात शरीर ही धर्म पालन का पहला साधन है।

यदि शरीर स्वस्थ नहीं रहेगा तो पूजा भी सार्थक नहीं हो सकती। अस्वस्थ शरीर से न तो मन एकाग्र हो सकता है और न ही हम अपने सांसारिक व आध्यात्मिक कर्तव्यों का ठीक से पालन कर सकते हैं।

मेरा मानना है कि घर की लक्ष्मी अर्थात महिलाओं का स्वस्थ रहना ही सबसे बड़ी पूजा है। महिलाओं का मानसिक व शारीरिक रूप से प्रसन्न और पोषित रहना ही घर में वास्तविक सुख, शांति और समृद्धि का कारण बनता है।

महीने में एक उपवास और शरीर का संतुलन

उपवास को केवल धार्मिक कर्मकांड के रूप में नहीं बल्कि स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से भी समझना चाहिए।

अक्सर उपवास को केवल अंधविश्वास या ईश्वर को प्रसन्न करने के एक हठ के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जबकि इसका मुख्य आधार मानव शरीर विज्ञान है। आधुनिक विज्ञान ने ऑटोफेजी (Autophagy) की प्रक्रिया को प्रमाणित किया है, जिसके लिए वर्ष 2016 में नोबेल पुरस्कार भी दिया गया। इस प्रक्रिया में उपवास के दौरान शरीर की कोशिकाएं स्वयं की मरम्मत करती हैं और अनावश्यक तथा विषाक्त तत्वों को हटाने का कार्य करती हैं।

सनातन परंपरा में एकादशी अथवा महीने में एक या दो उपवास रखने की व्यवस्था भी संभवतः शरीर और पाचन तंत्र को विश्राम देने की इसी सोच से जुड़ी रही है। हमारे ऋषियों-मुनियों ने शरीर विज्ञान के इस रहस्य को हजारों वर्ष पूर्व ही समझ लिया था और इसे धर्म से जोड़कर दैनिक दिनचर्या का हिस्सा बना दिया था ताकि जनसामान्य इसका पालन कर सके। इसलिए उपवास को अंधविश्वास नहीं बल्कि संयम, अनुशासन और स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से समझना अधिक उचित होगा। उपवास का अर्थ केवल भूखा रहना नहीं, बल्कि मन और शरीर का शोधन करना है।

भक्ति मार्ग वाले साधक और समाज में उनका योगदान

समाज में हर व्यक्ति की भूमिका अलग होती है और सभी की भूमिकाओं का अपना विशेष महत्व है।

जो संत, संन्यासी या पूर्णकालिक साधक हैं, उनका जीवन ईश्वर भक्ति, मंदिर या आश्रम सेवा और आध्यात्मिक वातावरण बनाए रखने के लिए समर्पित होता है। उनके लिए विस्तृत पूजा और साधना स्वाभाविक है। उनका कार्य समाज को आध्यात्मिक दिशा देना और वातावरण में सात्विकता बनाए रखना है।

वहीं गृहस्थ का धर्म अलग है। गृहस्थ समाज की रीढ़ है, जिस पर संपूर्ण व्यवस्था का भार टिका होता है। गृहस्थ का सबसे बड़ा धर्म है अपने परिवार का पालन पोषण करना, ईमानदारी से अपना कार्य करना, Tax का ईमानदारी से भुगतान करना, समाज और राष्ट्र के विकास में योगदान देना तथा कर्मयोग के मार्ग पर चलना। गृहस्थ के लिए उसका कर्तव्य स्थल ही उसका सबसे बड़ा पूजा गृह है।

"जब साधक अपने भक्ति मार्ग पर निष्ठावान रहेगा और गृहस्थ अपने कर्मयोग पर, तभी समाज में संतुलन और समृद्धि बनी रहेगी।"

इन दोनों मार्गों का घालमेल करने से ही भ्रम उत्पन्न होता है। गृहस्थ को संन्यासी जैसा व्यवहार करने की आवश्यकता नहीं है; उसे अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करते हुए ईश्वर को स्मरण रखना ही पर्याप्त है।